औरतें
चालीस की बेबाक़ होतीं
हैं
वो
फिर से जन्मती हैं,
पर इस बार
सिर्फ़ बेटी, बहन, और पत्नी होकर नहीं
बल्कि
एक इंसान बन कर
दुनिया
के टीम टॉम से
परे
वो
जीना चाहतीं है अब अपने
लिए
छोटी
छोटी बातों पे रो देने
वाली ये औरतें
अपने
जज़्बातों को समझाने के
लिए
अब
किसी से भीख नहीं मांगतीं,
कुछ
कहने सुनने के बाद
घंटों
बैठ कर सोचने वाली
इन औरतों को
अब
घंटा फर्क नहीं पड़ता
की दुनिया
उन्हें
किस तराज़ू पे रख के
तौल रही
क्यूंकि
औरतें चालीस की बिंदास होतीं
है
वो
देखतीं हैं आईने में
ख़ुद को मुस्कुरा कर
सराहतीं
हैं अपने बालों की
चांदनी, और
आँखों
की कोरों में पड़ने वाली
लकीरों को
थपथपाती
है ख़ुद को कहते
हुए की
"शाबाश! क्या
ख़ूब लड़ी हो तुम
जिंदगी से"
समझाती
हैं ख़ुद को, की
अब थोड़ा ठहर जाओ
कुछ
अपना भी ध्यान रखो,
ख़ुद के लिए जियो,
नाचो,
गाओ, थोड़ा ज़ोर से
खिलखिलाओ
भले
ही समाज उनमें एडल्ट्स
सा ग्रेस चाहता हो
पर
वो तो मदमस्त रहना
चाहतीं हैं
अपने
अंदर की उस नन्ही
लड़की जैसे
जिसे
बारिश में आज भी
भीगना,
फुदकना,
गुनगुनाना, थिरकना रिझाता है
उम्र
के इस दराज़ पे
ये ख़ुद ही ख़ुद
की
माँ
बाप भाई बहन दोस्त
हो जातीं हैं
किसी
रोक टोक की परवाह
से परे
ये
ज़ोर से हंसतीं हैं,
फ़फ़क कर रोतीं हैं,
इठलातीं
हैं, बलखातीं हैं, हर रोज़
एक
नए रंग में नज़र
आतीं हैं
क्यूंकि
औरतें चालीस की अल्हड़ सी
होतीं हैं
वो
पढ़ लेतीं हैं दूसरी औरत
की आँखों को,
उसके
माथे की लकीरों को,
उसकी
चुप्पी में उफ़नते सैलाब
को,
बिना
शब्दों में उलझे, बिना
कुछ कहे सुने,
कसमसा
जातीं हैं वो इस
बात से, की
कोई
फिर आज वैसे ही
तप रहा है
जैसे
वो कभी कुंदन होने
से पहले तपी थीं
लिपटा
लेती है अपनी छाती
से, वो
दर्द
में कसमसाते अपने ही अक्स
को
क्यूंकि
औरतें चालीस की माँ सी
होतीं हैं
औरतें
चालीस की बेबाक़ होतीं
हैं
वो
बिंदास होती हैं, वो
अल्हड़ होतीं हैं
वो
मदमस्त होतीं हैं, वो माँ
होती हैं,
वो,
वो आपका घर होतीं
हैं
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