Friday, 3 January 2025

'घर'


याद आती है जब घर की
तो बैठ जाती हूँ छत पर
कुछ देर आँखें मूंदे
महसूस करती हूँ सूरज की गर्माहट
जो देती हैं माँ के आलिंगन का एहसास
छू जाती है हवा, बदन को कुछ ऐसे
मानो सहला दिया हो मेरे माथे को या
रख दिया हो मेरे कंधे पर, पापा ने अपना हाथ
पत्तों की सरसराहट मालूम होती है जैसे
माँ फिर गुनगुना रही हो आज रसोई में
वही पुराना मीठा सा गान
चिड़ियों की चहचहाट लगती जैसे
भाई-बहन से होती मीठी सी तकरार
जी लेती हूँ उन दस मिनटों में पूरा बचपन
और फिर होतीं हूँ, एक और दिन के लिए तैयार
अद्भुत है, इस प्रकृति का वात्सल्य
इससे प्रिय कोई घर-बार नहीं
याद आती है जब घर की
तो बैठ जाती हूँ छत पर
कुछ देर आँखें मूंदे

2 comments:

Anonymous said...

Beautiful

Anonymous said...

Work never ends...take a break...go to home n meet everyone specially मां..however कविता उत्तम है